Friday, February 11, 2011

जिन्दगी की राह

जिन्दगी के इस सफ़र में , मै खुद को अकेला पता हु |
दूर किन्ही राहों में ,कुछ देख नहीं पता हु ||
सोचा था जिन्दगी के इन राहों में मिलेगा किसी का साथ,
पर आज तक उसके इंतजार में जिन्दगी बिताये जाता हु |
मुझे नहीं मालूम की इन्ही राहों में स्नेह से मला हाथ सहारा देगा की नहीं ,
पर उस छादिक मात्र पल के लिए जिन्दगी गुजारे जाता हु |
जिन्दगी के इस सफ़र में , मै खुद को अकेला पता हु |

जब चलता हु राहों पर अकेले अपनी तन्हाई के साथ 
तो उसी से गुफ्तगू करके दिल बहलाये जाता हु ,
जो अनगिनत राते इन राहों पर मैंने बिना सोये गुजारी है ,
वो राते आज भी मुझे उस अकेलेपन का एहसास कराये जाती है ,
मै समझ नहीं पता की जिन्दगी में आज तक कोई मेरा क्यों नहीं हुआ ,
शायद मैंने ही आज तक किसी को अपना होने का मौका ही नहीं दिया,
मै सोचता था जिन्दगी की रहे कितनी सरल होती है |
पर आज मालूम पड़ा की जिम्मेदारी के बोझ तले ये राहे भी कितनी मुश्किल हो जाती है,
जिन्दगी के इस सफ़र में , मै खुद को अकेला पता हु |

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